अध्यक्ष के इंकार ने खोला संदेहों का पिटारा, अब सवालों का तूफ़ान
एक्सक्लूसिव रिपोर्ट | बेंगलूरू
धार्मिक और सामाजिक सेवा के नाम पर संचालित श्री सालासर बालाजी सेवा समिति इन दिनों गहरे विवादों के केंद्र में है। समिति के अध्यक्ष प्रमोद मुरारका द्वारा अनिवार्य और कानूनी रूप से आवश्यक सूचनाओं को देने से स्पष्ट और सार्वजनिक इंकार किए जाने के बाद यह मामला अब “अंदर क्या चल रहा है?” की दिशा में तेजी से मोड़ ले चुका है।
इस एक्सपोज़ में समिति के अंदरूनी संचालन, वित्तीय गतिविधियों, सदस्यता संरचना और पंजीकरण नियमों से जुड़े ऐसे कई सवाल सामने आए हैं, जिन्हें अब टला नहीं जा सकता।
बड़ा खुलासा 1: सदस्यता पर रहस्य का पर्दा—कितने सदस्य? किसे पता?
23 जून 2022 को पाँच Founder Trustees के साथ शुरू हुई समिति आज किस स्वरूप में है—इसकी कोई स्पष्ट जानकारी अध्यक्ष देने को तैयार नहीं।
* Life Trustee कितने?
* Life Member कितने?
* General Member कितने?
समिति के अध्यक्ष ने इन मूलभूत सूचनाओं को भी साझा करने से मना कर दिया।
इससे यह संदेह गहराता है कि सदस्यता के नाम पर कहीं कोई खेल तो नहीं चल रहा?
बड़ा खुलासा 2: ट्रस्ट का पता बदल गया—लेकिन रिकॉर्ड कहाँ है?
पंजीकरण के समय ट्रस्ट का पता Manit Somani के पते पर दर्ज था।
आज पता बदल चुका है—लेकिन:
* क्या परिवर्तन की सूचना सोसाइटी/रजिस्टार कार्यालय को दी गई?
* यदि दी, तो दस्तावेज़ कहाँ हैं?
* यदि नहीं दी, तो पता बदलने की जरूरत क्यों पड़ी और इसे छुपाया क्यों गया?
यह अपने आप में एक बड़ा लाल संकेत है।
बड़ा खुलासा 3: दान की राशि… पर ऑडिट का नामोनिशान नहीं!
समिति दान राशि प्राप्त करती है—यह सब जानते हैं।
लेकिन अब तक:
* वार्षिक ऑडिट हुआ या नहीं?
* ऑडिटेड रिपोर्ट जमा हुई या नहीं?
* दान का हिसाब कैसे रखा गया?
अध्यक्ष ने इन सभी प्रश्नों पर मौन साध लिया।
धार्मिक दान की राशि का हिसाब पारदर्शी न होना खुद एक अत्यंत गंभीर मामला है।
बड़ा खुलासा 4: मंदिर निर्माण पर सिर्फ कागज़ी बातें?
उद्देश्य-पत्र में बिंदु संख्या 19—मंदिर निर्माण—सबसे बड़ा वादा है।
लेकिन आज तक:
* नक्शा?
* प्रारंभिक तैयारी?
* कोई प्रोजेक्ट रिपोर्ट?
कुछ भी सामने नहीं।
*क्या मंदिर निर्माण का वादा सिर्फ लोगों का विश्वास हासिल करने के लिए किया गया था?*
बड़ा खुलासा 5: सोसाइटी कार्यालय में ZERO दस्तावेज़—यह कैसे संभव?
उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार समिति ने आज तक:
सोसाइटी कार्यालय में एक भी अनिवार्य दस्तावेज़ जमा नहीं कराया है।
यह सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट का गंभीर उल्लंघन माना जाता है।
यदि यह सही है, तो समिति की वैधानिक स्थिति ही संदिग्ध हो सकती है।
सबसे बड़ा मोड़: अध्यक्ष ने कहा—“मेरे वकील से बात करो”
लेकिन वकील का नाम तक बताने से मना कर दिया**
पत्र भेजने और 7 दिनों का समय देने के बावजूद जब श्री प्रशांत गोयनका ने जानकारी चाही, तो अध्यक्ष मुरारका ने कहा:
“मेरे वकील से संपर्क करें।”
लेकिन जब उनसे अधिवक्ता का नाम, नंबर, या कोई भी विवरण मांगा गया—
उन्होंने सीधे इंकार कर दिया।
यह गैर-सहयोगी रवैया कई परतों वाले संदेहों को जन्म देता है:
* क्या समिति के भीतर वित्तीय अनियमितताएँ हैं?
* क्या सदस्यता में हेरफेर हुआ है?
* क्या दान राशि का सही उपयोग नहीं हुआ?
* क्या कागज़ पर ही गतिविधियाँ चल रही हैं?
अध्यक्ष की चुप्पी अब किसी भी तरह से “सामान्य” नहीं कही जा सकती।
कानूनी विशेषज्ञों की चेतावनी: मामला अब कार्रवाई की सीमा में प्रवेश कर चुका है
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि—
* ऑडिट न कराना
* पते में परिवर्तन की सूचना छुपाना
* दान का दस्तावेज़ीकरण न होना
* सोसाइटी में रिकॉर्ड जमा न कराना
ये सभी कृत्य सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट, वित्तीय नियमों और ट्रस्ट कानूनों का गंभीर उल्लंघन हो सकते हैं।
इस स्थिति में समिति किसी भी समय जांच, नोटिस या विधिक कार्यवाही के दायरे में आ सकती है।
निष्कर्ष: सालासर समिति के भीतर कुछ बड़ा छुपाया जा रहा है—जाँच का दबाव बढ़ा
अध्यक्ष का जानकारी देने से इंकार, अधिवक्ता का विवरण न देना और मूलभूत रिकॉर्ड का अभाव—
यह सब मिलकर एक ही बात की ओर इशारा करता है:
समिति के भीतर कई परतें छुपी हैं।
यह एक्सपोज़ अब एक बड़ा सवाल खड़ा करता है
क्या समिति सही तरीके से संचालित हो रही है, या पर्दे के पीछे कुछ ऐसा चल रहा है जिसे बाहर आने से रोका जा रहा है?
जाँच की माँग तेज़ हो चुकी है।
अब निगाहें नियामक एजेंसियों और रजिस्ट्री कार्यालय पर।