समाचार परिवर्तन ब्यूरो | बेंगलुरु
बालाजी मंदिर निर्माण परियोजना पर वित्तीय पारदर्शिता, निर्णय प्रक्रिया और जवाबदेही को लेकर बढ़ा विवाद; स्वतंत्र ऑडिट और सरकारी जांच की मांग तेज
बेंगलुरु में निर्माणाधीन श्री सालासर बालाजी मंदिर परियोजना को लेकर श्री सालासर बालाजी सेवा ट्रस्ट के भीतर असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। ट्रस्ट के कुछ ट्रस्टियों, आजीवन सदस्यों और सामान्य सदस्यों ने ट्रस्ट के संचालन, वित्तीय पारदर्शिता और निर्णय प्रक्रिया पर गंभीर प्रश्न उठाते हुए आरोप लगाया है कि संस्था का संचालन सीमित समूह के नियंत्रण में होता जा रहा है और महत्वपूर्ण निर्णय व्यापक सहमति के बिना लिए जा रहे हैं।
शिकायत करने वाले सदस्यों के अनुसार, ट्रस्ट के अध्यक्ष प्रमोद मुरारका, उपाध्यक्ष सतीश मित्तल, सचिव मनीष सोमानी, कोषाध्यक्ष विक्रम अग्रवाल तथा निर्माण समिति के अध्यक्ष संजय शाह पर संस्था के महत्वपूर्ण निर्णयों को सीमित स्तर पर लेने और अन्य ट्रस्टियों को पर्याप्त जानकारी न देने के आरोप लगाए गए हैं।
हिसाब-किताब को लेकर बढ़ता असंतोष
असंतुष्ट सदस्यों का कहना है कि उन्होंने कई बार ट्रस्ट की आय-व्यय, दान राशि, निर्माण कार्य पर हुए खर्च, बैंक खातों तथा अन्य वित्तीय अभिलेखों की जानकारी मांगी, लेकिन अब तक उन्हें संतोषजनक विवरण उपलब्ध नहीं कराया गया।
सदस्यों का कहना है कि जनता और श्रद्धालुओं के सहयोग से संचालित किसी भी धार्मिक ट्रस्ट की पहली जिम्मेदारी पूर्ण वित्तीय पारदर्शिता सुनिश्चित करना है। उनका तर्क है कि मंदिर निर्माण के नाम पर प्राप्त प्रत्येक रुपये का सार्वजनिक लेखा-जोखा उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
‘चक्रव्यूह’ कार्यक्रम ने बढ़ाए सवाल
विवाद उस समय और गहरा गया जब ट्रस्ट द्वारा हिंदी नाटक ‘चक्रव्यूह’ के माध्यम से फंड-रेज़िंग कार्यक्रम आयोजित किए जाने की जानकारी सामने आई। शिकायत करने वाले सदस्यों का दावा है कि इस कार्यक्रम पर लगभग ₹40 से ₹50 लाख तक खर्च होने का अनुमान है।
उनका प्रश्न है कि यदि ट्रस्ट पहले ही मंदिर निर्माण के लिए पर्याप्त धन उपलब्ध होने का दावा कर चुका था, तो अतिरिक्त फंड-रेज़िंग कार्यक्रम आयोजित करने की आवश्यकता क्यों पड़ी। उनका यह भी आरोप है कि इस निर्णय के लिए न तो वार्षिक आम सभा (AGM) बुलाई गई और न ही असाधारण आम सभा (EGM), जबकि ऐसे निर्णय व्यापक सहमति से लिए जाने चाहिए थे।
स्वतंत्र ऑडिट की मांग
असंतुष्ट सदस्यों का कहना है कि यदि सभी वित्तीय अभिलेख, दान का विवरण, निर्माण पर हुए खर्च और प्रमुख निर्णयों के रिकॉर्ड सार्वजनिक कर दिए जाएं तो विवाद स्वतः समाप्त हो सकता है।
इसी आधार पर उन्होंने ट्रस्ट का स्वतंत्र ऑडिट, वैधानिक वित्तीय जांच तथा संबंधित सरकारी प्राधिकरणों द्वारा नियमों के अनुपालन की समीक्षा कराने की मांग की है। उनका कहना है कि ऐसी जांच से या तो उठे हुए संदेह दूर होंगे या यदि कोई अनियमितता है तो वह सामने आ सकेगी।
ट्रस्ट का पक्ष
इस समाचार में उल्लिखित आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है और किसी सक्षम प्राधिकारी ने ट्रस्ट के पदाधिकारियों के विरुद्ध किसी प्रकार की अनियमितता का निष्कर्ष नहीं दिया है।
शिकायत करने वाले सदस्यों का कहना है कि उन्होंने ट्रस्ट पदाधिकारियों से इन आरोपों पर प्रतिक्रिया प्राप्त करने का प्रयास किया, लेकिन उन्हें विस्तृत उत्तर नहीं मिला। इस विषय पर ट्रस्ट का आधिकारिक पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
सबसे बड़ा प्रश्न
यह विवाद केवल वित्तीय प्रबंधन का नहीं, बल्कि सार्वजनिक विश्वास का भी है। धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं की सबसे बड़ी पूंजी श्रद्धालुओं का विश्वास होती है। यदि उस विश्वास को बनाए रखना है तो पारदर्शिता, जवाबदेही और सामूहिक निर्णय प्रक्रिया को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी।
अब निगाहें इस बात पर हैं कि क्या ट्रस्ट अपने वित्तीय अभिलेख सार्वजनिक करेगा, क्या स्वतंत्र ऑडिट कराया जाएगा और क्या सदस्यों द्वारा उठाए गए प्रश्नों का दस्तावेज़ी उत्तर दिया जाएगा।