बालाजी सेवा समिति पर गहराता संकट: महंगे आयोजनों से लेकर गायब हिसाब तक, भरोसे की नींव हिलती हुई

बेंगलुरु; श्री सालासर बालाजी सेवा समिति से जुड़ा विवाद अब किसी एक फैसले तक सीमित नहीं रहा। यह मामला अब विश्वसनीयता, पारदर्शिता और संस्थागत जवाबदेही के गहरे संकट में बदल चुका है। जो सवाल पहले एक महंगे फंडरेज़िंग कार्यक्रम से शुरू हुए थे, वे अब सीधे हिसाब-किताब की अनुपस्थिति और वित्तीय अपारदर्शिता तक पहुंच चुके हैं और पूरा मंदिर निर्माण प्रोजेक्ट संदेह के घेरे में आ गया है।

विवाद की शुरुआत बेंगलुरु में आयोजित किए जाने वाले ”चक्रव्यूह” नाटक आधारित फंडरेज़िंग कार्यक्रम से हुई, जिस पर ₹40–50 लाख खर्च होने का अनुमान है। यह तब, जब समिति पहले ही ₹20 करोड़ की निधि जुटाने का दावा कर चुकी थी। स्वाभाविक रूप से सदस्यों ने सवाल उठाया — जब परियोजना के लिए पर्याप्त धन उपलब्ध है, तो फिर इतने महंगे आयोजन की आवश्यकता क्या है?

इससे भी अधिक चिंताजनक यह आरोप रहा कि यह निर्णय बिना AGM, बिना EGM और बिना किसी औपचारिक प्रस्ताव के लिया गया। इससे यह धारणा मजबूत हुई कि समिति सामूहिक और पारदर्शी प्रक्रिया के बजाय एक सीमित समूह के नियंत्रण में काम कर रही है।

लेकिन असली संकट इसके बाद सामने आया। अब ट्रस्टी और सामान्य सदस्य लगातार यह आरोप लगा रहे हैं कि बार-बार मांगने के बावजूद वित्तीय हिसाब प्रस्तुत नहीं किया जा रहा है। चक्रव्यूह कार्यक्रम से कितना धन आया, कितना खर्च हुआ, क्या कोई बचत हुई  इन बुनियादी सवालों पर भी कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया गया। यही नहीं, कई सदस्यों का कहना है कि सवाल उठाने पर उन्हें नजरअंदाज या अपमानित तक किया जा रहा है।

यहीं से यह विवाद केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि नैतिक संकट बन जाता है। एक सामाजिक और धार्मिक संस्था, जो जनता के चंदे और आस्था पर चलती है, वह निजी संस्था की तरह बंद दरवाजों में नहीं चल सकती।
हर रुपये का हिसाब देना अनिवार्य है, हर निर्णय का औचित्य स्पष्ट होना चाहिए।

बढ़ते असंतोष के बीच अब स्वतंत्र ऑडिट, वैधानिक जांच और कानूनी हस्तक्षेप की मांग तेज हो रही है। सवाल अब सिर्फ मंदिर निर्माण का नहीं है — सवाल है उस भरोसे का, जिसके आधार पर लोगों ने अपनी मेहनत की कमाई इस परियोजना को सौंपी।

जब तक समिति पूर्ण वित्तीय विवरण, निर्णय प्रक्रिया और आधिकारिक रिकॉर्ड सार्वजनिक नहीं करती, तब तक बालाजी मंदिर परियोजना पर अविश्वास का साया और गहरा होता जाएगा।

आस्था पर बनी संस्था अपारदर्शिता में नहीं चल सकती — और जवाबदेही से भागने वाला नेतृत्व अधिक समय तक टिक नहीं सकता।

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