बेंगलुरु — श्री सालासर बालाजी सेवा समिति के मंदिर निर्माण प्रोजेक्ट पर अब कड़ा सवालिया शिकंजा कस गया है। अपारदर्शी निर्णय-प्रक्रिया, वित्तीय अनुशासन की उपेक्षा और ट्रस्ट नियमों को खुले तौर पर दरकिनार करने के आरोपों ने कोर कमेटी को गंभीर विवाद के केंद्र में ला खड़ा किया है। जानकारी के मुताबिक, अध्यक्ष प्रमोद मुरारका, उपाध्यक्ष सतीश मित्तल और सचिव मनीत सोमानी की अगुवाई वाली कमेटी ने बेंगलुरु में हिंदी नाटक “चक्रव्यूह” के मंचन के माध्यम से फंड-रेज़िंग कार्यक्रम करने का फैसला लिया — और यह निर्णय कथित तौर पर बिना व्यापक सहमति, बिना औपचारिक मंजूरी और बिना किसी वैध सामूहिक प्रस्ताव के लिया गया।
सूत्रों का कहना है कि कार्यक्रम पर 40 से 50 लाख रुपये तक का खर्च प्रस्तावित है। यह वही समिति है जिसने 5 अक्टूबर 2024 में ही 20 करोड़ रुपये की निर्माण निधि सुनिश्चित होने का दावा किया था और लगातार चंदे आते रहने की बात कही थी। ऐसे में ट्रस्ट के भीतर से सीधा सवाल उठ रहा है — जब धन की कमी नहीं है, तो फिर यह महंगा आयोजन किसके लिए और किस उद्देश्य से? क्या श्रद्धालुओं के दान की राशि मंदिर निर्माण के बजाय प्रचार-प्रदर्शन पर खर्च की जा रही है?
आलोचकों का आरोप है कि समिति ने न तो एजीएम बुलाई, न ईजीएम, न ही किसी आधिकारिक प्रस्ताव को रिकॉर्ड में रखा — और पूरा निर्णय एक सीमित समूह के भीतर तय कर दिया गया। इस पर आरोप और सख्त होते जा रहे हैं कि ट्रस्ट अब सार्वजनिक संस्था की तरह नहीं, बल्कि कुछ लोगों के निजी नियंत्रण और शक्ति-केंद्रित शैली में चलाया जा रहा है। कई सदस्य इसे व्यक्तिगत प्रतिष्ठा-सम्मान बढ़ाने की कोशिश बताते हैं, जबकि निर्माण की गति सुस्त है और वित्तीय खुलासे लगातार अधूरे हैं। स्वयंसेवी सेवाओं के प्रस्ताव ठुकराए जा रहे हैं, जबकि खर्च बढ़ते जा रहे हैं — और जवाबदेही का कोई ठोस संकेत अब भी दिखाई नहीं देता। बताया जाता है कि कोर कमेटी के सदस्यों ने इस मामले पर प्रतिक्रिया देने से इनकार कर दिया।
बढ़ते आक्रोश के बीच, समिति के भीतर से स्वतंत्र ऑडिट, वैधानिक अनुपालन जांच और सभी वित्तीय अभिलेखों को सार्वजनिक करने की मांग तेज हो गई है। आलोचकों का कहना है कि आस्था और जन-दान से चलने वाली परियोजना में जवाबदेही को टाला नहीं जा सकता — और चुप्पी या गोपनीयता को शासन-शैली के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
इस विवाद के केंद्र में एक कठोर नैतिक प्रश्न खड़ा है — श्रद्धा से प्राप्त धन केवल रकम नहीं, बल्कि जिम्मेदारी भी है। जब तक समिति अपने खातों, निर्णय-प्रक्रिया और सभी प्रस्तावों को पारदर्शी रूप से सामने नहीं लाती, तब तक बालाजी मंदिर परियोजना के ऊपर संदेह और अविश्वास का बादल और घना होता जाएगा।
धार्मिक ट्रस्ट बंद दरवाज़ों के पीछे नहीं चल सकता — और अब समुदाय इस चुप्पी को स्वीकार करने को तैयार नहीं है।